वैभव लक्ष्मी कथा क्रमश:...

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक व्रत किया। इक्कीसवें शुक्रवार को विधिपूर्वक उद्यापन विधि करके सात स्त्रियों को वैभवलक्ष्मी व्रत की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माता जी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगी: ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखण्ड रखना। कुंवारी लड़की को मनभावन पति देना। जो कोई आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उसकी सब विपत्ति दूर करना। सब को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के धनलक्ष्मी स्वरूप की छवि को प्रणाम किया।

Vaibhav Laxmi katha Continue...

Sheela completed her twenty one Friday vrat with full dedication and devotion. She did the udyapan vidhi on twenty first Friday and give book of vaibhav laxmi vrat to seven married women as a gift. After that she bow down towards the form of ‘Dhan Laxmi’ and said – “O maa Dhan laxmi! I had completed your vrat today which I had promised. O Maa! Remove my all problems. Do welfare for us. Blessed with child to issueless couple. give intact suhag to married women. Give suitable husband to unmarried girl. remove all problems to those devotees who keep this miraculous vrat.Give happiness to all.O Maa! Your majesty is infinit.” She bow down toward the form of Dhanlaxmi after said this.