List of Ekadashi 2017 (एकादशी व्रत २०१७)

एकादशी व्रत

एक वर्ष में बारह महीने होते हैं और एक महीने में दो एकादशी होती हैं, सो एक वर्ष में चौबीस एकादशी हुई। जिस वर्ष अधिक मास (मलमास) पड़ता है उस वर्ष दो एकादशी और बढ़ जाती हैं। इस तरह कुल छब्बीस एकादशी होती है:-
१. उत्पन्ना एकादशी
२. मोक्षदा एकादशी (मोक्ष को देनेवाली)
३. सफला एकादशी (सफलता देने वाली)
४. पुत्रदा एकादशी (पुत्र को देनेवाली)
५. षटतिला एकादशी
६. जया एकादशी
७. विजया एकादशी
८. आमलकी एकादशी
९. पापमोचनी एकादशी (पापों को नष्ट करने वाली)
१०. कामदा एकादशी
११. बरुथनी एकादशी
१२. मोहनी एकादशी
१३. अपरा एकादशी
१४. निर्जला एकादशी
१५. योगिनी एकादशी
१६. देवशयनी एकादशी
१७. कामिका एकादशी
१८. पुत्रदा एकादशी
१९. अजा एकादशी
२०. परिवर्तिनी एकादशी
२१. इंदिरा एकादशी
२२. पापाङ्कुशा एकादशी
२३. रमा एकादशी
२४. देवोत्थनी एकादशी
अधिक मास की दो एकादशी
२५. पद्मिनी एकादशी
२६. परमा एकादशी

एकादशी महात्म्य:-

जो पुण्य चन्द्र या सुर्य ग्रहण में स्नान या दान से होता है, तथा जो पुण्य अन्न दान, जल दान, स्वर्ण दान, भूमि दान, गौ दान, कन्या दान तथा अश्वमेघादि यज्ञ करने से होता है। जो पुण्य तीर्थ यात्रा तथा कठिन तपस्या करने से होता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी व्रत रखने से होता है। एकादशी व्रत रखने सए शरीर स्वस्थ तहता, हृदय शुद्ध हो जाता है, श्रद्धा भक्ति उत्पान होती है ।प्रभु को प्रसन्न करने का मुख्य साधन एकादशी का व्रत है। एकादशी व्रत करने वाले के पितृ कुयोनि को त्याग कर सवर्ग में कहले जाते हैं, एकादशी व्रत करने वाले के दस पूर्वज पितृ पक्ष के , दस पूर्वज मातृ पक्ष के और दस पूर्वज पत्नी पक्ष के बैकुण्ठ को जाते हैं। दूध, पुत्र, धन और कीर्ति को बढ़ाने वाला यह एकादशी व्रत है। एकादशी का जन्म भगवान के पावन शरीर से हुआ है, यह प्रभु नारायण के समान पतित पावनी हैं।
एकादशी को ध्यान देने योग्य बातें:-
दशमी तिथि को सात्विक भोजन करें।
मसूर की दाल का सेवन ना करें।
ब्रह्मचर्य का पालन करें।
एकादशी तिथि के महत्त्वपूर्ण नियम-
लकड़ी का दातुन ना करें।
निम्बु, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और ऊंगली से कंठ शुद्ध कर लें।
वृक्ष से पत्ता न तोड़े।
चोर, पाखण्डी और दुराचारी मनुष्यों से बात न करें।
किसी को कड़वे वचन न बोलें।
पूरे दिन प्रभु के नाम का जप करें।
घर में झाड़ू न लगायें, किसी वस्त्र से घर को साफ कर लें, क्योंकि झाड़ू लगाने से चींटी आदि छोटे जीव मर जाते हैं।
बाल नहीं कटवाने चाहिये।
कम बोलें।
अन्न का दान करें।
अन्न का दान न लें।
जो फलाहारी करते हैं उन्हें गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा का साग इत्यादि न खाना चाहिये।
आम, अंगूर, केला, बादाम, पिश्ता इत्यादि फलों का सेवन करें।
प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर खानी चाहिये।
रात्रि जागरण करना चाहिये।

जानिये कैसे हुआ एकादशी माता का प्रादुर्भाव:‌-

सतयुग में एक मुर नामक दानव हुआ । वह बड़ा ही रौद्र तथा सम्पूर्ण देवताओं लिये भयंकर था। उस दुरात्मा महासुर ने इंद्र आदि सभी देवताओं को जीत लिया था। सभी देवता उससे परास्त होकर पृथ्वी पर विचरा करते थे। सभी देवतागण इंद्र के नेतृत्व में महादेव के पास गये और उनसे इस विपत्ति को दूर करने के उपाय के बारे में पूछा।
तब महादेव जी ने कहा – “देवराज! आप सभी देवताओं के साथ भगवान गरुड़ध्वज के पास जायें।वे हीं आपके कष्टों का निवारण करेंगे।”
भगवान महादेव के कथानुसार परम बुद्धिमान देवराज इंद्र सम्पूर्ण देवताओं के साथ भगवान गदाधर के निव्वास स्थान क्षीरसागर एं गये और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। इंद्रे ने सभी विपत्तियों के बारे में प्रभु को बतलाया और निवारण के लिये प्रार्थना की।
इंद्र की बात सुनकर भगवान विष्णु बोले- “देवराज! वह दानव कैसा है? उसका रूप और बल कैसा है तथा उस दुष्ट के रहने का स्थान कहाँ है ?”
इंद्र बोले- “देवदेवेश्वर! चंद्रावती नाम से प्रसिद्ध एक नगरी है, उसी में स्थान बनाकर वह मुर दैत्य निवास करता है। उस दैत्य ने समस्त देवताओं को परास्त करके स्वर्गलोक से बाहर कर दिया है। उसने एक दूसरे ही इंद्र को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठाया है। देवताओं को तो उसने प्रत्येक स्थान से वंचित कर दिया है।”
इंद्र का कथन सुनकर भगवान जनार्दन को बड़ा क्रोध हुआ। वे देवताओं को साथ लेकर चंद्रावतीपुरी में गये। देवताओं ने देखा, दैत्यराज बारम्बार गर्जना कर रहा है। उससे परास्त होकर सम्पूर्ण देवता दसों दिशाओं में भाग गये। अब वह दानव भगवान विष्णु को देखकर बोला- ‘ खड़ा रह ! खड़ा रह !’ उसकी ललकार सुनकर भगवान के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। वे बोले- “अरे दुराचारी दानव ! मेरी इन भुजाओं को देख। ” यह कहकर श्री विष्णु ने अपने दिव्य बाणों से सामने आये हुए दुष्ट दानवों को मारना आरम्भ किया। दानव भय से विह्वल हो उठे। तत्पश्चात श्री विष्णु ने दैत्य-सेना पर चक्र का प्रहार किया। उससे छिन्न-भिन्न होकर सैकड़ों योद्धा मौत के मुख में चले गये। इसके बाद भगवान मधुसूदन बदरिकाश्रम को चले गये। वहाँ सिंहावती नाम की गुफा थी, जो बारह योजन लम्बी थी। उस गुफा में एक हे दरवाजा था। भगवान विष्णु उसी में सो गये। दानव मुर भगवान को मार डालने के उद्योग में लगा था। वह उनके पीछे लगा रहा। वहाँ पहुँचकर उसने भी उसी गुफा में प्रवेश किया। वहाँ भगवान को सोते देख उसे बड़ा हर्ष हुआ। उसने सोचा ‘यह दानवों को भय देनेवाला देवता है। अत: नि:संदेह इसे मार डालूँगा।’ दानव के इस प्रकार विचार करते ही भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई, जो बड़ी ही रूपवती, सौभाग्यशालिनी तथा दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से युक्त थी। वह भगवान के तेज के अंश से उत्पन्न हुई थी। उसका बल और पराक्रम महान था। दानवराज मुर ने उस कन्या को देखा । कन्या ने युद्ध का विचार करके दानव के साथ युद्ध की याचना की। युद्ध छिड़ गया । कन्या सब प्रकार की युद्धकला में निपुण थी। वह मुर नामक महान असुर हुंकार मात्र से राख का ढ़ेर हो गया। दानव के मारे जाने पर भगवान जाग उठे । उन्होंने दानव को धरती पर पड़ा देखकर पूछा- “मेरा यह शत्रु अत्यंत उग्र और भयंकर था, किसने इसका वध किया है ? ”
कन्या बोली- “स्वामिन! आपके ही प्रसाद से मैंने इस महादैत्य का वध किया है। ”
श्री भगवान ने कहा- “कल्याणी! तुम्हारे इस कर्म से तीनों लोकों के मुनि और देवता आनन्दित हुए हैं। अत: तुम्हारे मन में जैसी रूचि हो, उसके अनुसार मुझसे कोई वर माँगो ; देवदुर्लभ होने पर भी वह वर मैं तुम्हें दूँगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।”
वह कन्या साक्षात एकादशी ही थी। उसने कहा- “प्रभो ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपकी कृपा से सब तीर्थों मे प्रधान , समस्त विघ्नों का नाश करनेवाली तथा सब प्रकार की सिद्धि देनेवाली देवी होऊँ। जनार्दन! जो लोग आपमें भक्ति रखते हुए मेरे दिन को उपवास करेंगे उन्हें सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो। माधव! जो लोग उपवास, नक्त अथवा एकभुक्त करके मेरी व्रत का पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म और मोक्ष प्रदान कीजिये।”
श्री विष्णु बोले- “कल्याणी! तुम जो कुछ कहती हो, वह सब पूर्ण होगा।”
इस प्रकार से एकादशी का प्रादुर्भाव हुआ।