सोमवती अमावस्या पूजा विधि एवं कथा - Somvati Amavasya Vrat Vidhi and Katha in Hindi
सोमवती अमावस्या का महत्त्व:-

हिंदी मास के अनुसार हर मास में अमावस्या आती है । लेकिन जब किसी भी माह में सोमवार के दिन अमावस्या तिथि पड़ती है तो उसे, सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस वर्ष सोमवती अमावस्या २१ अगस्त (21 August) एवं १८ दिसम्बर (18 December) २०१७ को है। इस दिन के व्रत का महत्त्व हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी दिया गया है। विवाहित स्त्री अपने पति की लम्बी आयु के लिये इस दिन व्रत रखती है। यह पितृ दोष के निवारण में भी सहायक है। इस दिन को गंगा स्नान का भी बड़ा महत्व है। जो मनुष्य गंगा स्नान को नहीं जा सकते, वे अपने घर में हीं पानी में गंगा जल मिला कर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करें। इस दिन स्नान दान का विशेष महत्व है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने से सहस्त्र गौ दान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र के ब्रह्मा सरोवर में स्नान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
• सोमवती अमावस्या के दिन भगवान सूर्य को जल देना चाहिए, इससे गरीबी और दरिद्रता दूर होती है ।
• 108 बार तुलसी परिक्रमा करें।
• इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।
• इस दिन पितरों के तर्पण का कार्य भी किया जाता है ।
• सोमवार को भगवान शिव का वार है, अत: सोमवती अमावस्या को शिव एवं हनुमान जी की पूजा करने से कठिनाईयाँ दूर होती है ।
• इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा व पेड़ की जड़ में दीपक जलाना चाहिए तथा शनि देव की भी पूजा करनी चाहिये।

सोमवती अमावस्या पूजन सामग्री - Somvati Amavasya Pujan Samagri

• पुष्प • माला • अक्षत • चंदन • कलश • दीपक • घी • धूप • रोली • भोग • धागा • सिंदूर
• चूड़ी / बिंदी / सुपारी / पान के पत्ते / मूंगफली – 108 की संख्या में (जिससे परिक्रमा आसानी से पूरी हो जाये)

सोमवती अमावस्या व्रत विधि :- Somvati Amavasya Vrat Vidhi

सोमवती अमावस्या का व्रत विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु के लिये करती है । इसे अश्वत्थ (पीपल) प्रदक्षिणा व्रत भी कहते हैं। इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्म तथा स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन लें। अब सभी पूजन सामग्री लेकर पीपल के वृक्ष के पास जायें। पीपल की जड़ में लक्ष्मी नारायण की स्थापना करके दूध /जल अर्पित करें। पीपल की जड़ में सूत लपेट दें। भगवान का ध्यान करके पुष्प, अक्षत, चन्दन, भोग, धूप इत्यादि अर्पण करें। फिर प्रेमपूर्वक हाथ जोड़कर भगवान की प्रार्थना करें। अब पेड़ के चारों ओर “ॐ श्री वासुदेवाय नम:” बोलते हुए 108 बार परिक्रमा करें। इसके बाद कथा सुनें अथवा सुनाये। सामर्थ्यानुसार दान दें। ऐसा करने से भगवान पुत्र, पौत्र, धन, धान्य तथा सभी मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इस दिन मूली और रूई का स्पर्श ना करें।