मार्गशीर्ष (अगहन) संकष्टी चतुर्थी -गणेश चतुर्थी

मार्गशीर्ष मास की संकष्टी चतुर्थी ०७ नवम्बर,२०१७ (मंगलवार) को है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी विघ्न बाधायें दूर होती है। इस तिथि को ‘गजानन’ गणेश की पूजा की जाती है। यदि संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़े तो यह अति शुभकारक मानी गयी है। मंगलवार के दिन पड़ने वाली चतुर्थी को “अंगारकी चतुर्थी” कहते हैं। गणेश अंगारकी चतुर्थी का व्रत करने से पूरे साल भर के चतुर्थी व्रत के करने का फल प्राप्त होता है।
ऐसी मान्यता है कि अंगारक (मंगल देव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने वरदान दिया और कहा कि चतुर्थी तिथि यदि मंगलवार को होगी तो उसे अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जायेगा। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी काम बिना किसे विघ्न के सम्पूर्ण हो जाते हैं। भक्तों को गणेश जी की कृपा से सारे सुख प्राप्त होते हैं ।

पूजन सामग्री:-

∗ गणेश जी की प्रतिमा, ∗ धूप, ∗दीप, ∗ नैवेद्य (मोदक तथा अन्य ऋतुफल), ∗अक्षत, ∗फूल, ∗ कलश, ∗चंदन, ∗ केसरिया, ∗ रोली, ∗ कपूर, ∗ दुर्वा, ∗पंचमेवा, ∗ गंगाजल, ∗ वस्त्र(2- कलश और गणेश जी के लिये), ∗ अक्षत, ∗ घी, ∗ पान, ∗ सुपारी, ∗ लौंग, ∗ इलायची, ∗ गुड़, ∗ पंचामृत (कच्चा दूध,दही,शहद,शर्करा,घी)

हवन के लिये:-

∗जौ, ∗चावल, ∗चीनी, ∗तिल, ∗घी

मार्गशीर्ष (अगहन) संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजा विधि:-

प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो, शुद्ध हो कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप,दीप, नैवेद्य,अक्षत,फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर मन-ही-मन श्री गणेश का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प करें:-
"मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये"
अब कलश में जल भरकर उसमें थोड़ा गंगा जल मिलायें । कलश में दूर्वा, सिक्के, साबुत हल्दी रखें। उसके बाद लाल कपड़े से कलश का मुख बाँध दें। कलश पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। पूरे दिन श्री गणेशजी के मंत्र का स्तवन करें।संध्या को दुबारा स्नान कर शुद्ध हो जायें। श्री गणेश जी के सामने सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। विधि-विधान से गणेश जी का पूजन करें। वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में १० लड्डु अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। जौ, चावल, चीनी, तिल व घी से हवन करें । तत्पश्चात् गणेश जी की आरती करें। ५ लड्डु प्रसाद के रूप में बाँट दें और शेष ५ अगले दिन ब्राह्मण को दान में दे ।