श्रावण मास की संकष्टी / अंगारकी चतुर्थी - savan sankashti / angarki chaturthi

श्रावण मास की संकष्टी चतुर्थी ३१ जुलाई २०१८ (मंगलवार) को है। यह व्रत करने से सभी प्रकार की बाधायें दूर होती है। इस व्रत को करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। किसी प्रकार का संकट आने पर इस व्रत को करने से मनुष्य संकट मुक्त हो जाता है। यह विद्यार्थियों को विद्या तथा धनेच्छु को धन की प्राप्ति करवाता है। संतान की इच्छा करने वाले को संतान प्राप्ति, रोगग्रस्त को व्याधिमुक्त करता है।
यदि संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़े तो यह अति शुभकारक मानी गयी है। मंगलवार के दिन पड़ने वाली चतुर्थी को “अंगारकी चतुर्थी” कहते हैं। गणेश अंगारकी चतुर्थी का व्रत करने से पूरे साल भर के चतुर्थी व्रत के करने का फल प्राप्त होता है।
अंगारक (मंगल देव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने वरदान दिया और कहा कि चतुर्थी तिथि यदि मंगलवार को होगी तो उसे अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जायेगा। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी काम बिना किसे विघ्न के सम्पूर्ण हो जाते हैं। भक्तों को गणेश जी की कृपा से सारे सुख प्राप्त होते हैं ।

श्रावण मास की संकष्टी/ अंगारकी चतुर्थी संछिप्त पूजा विधि:-

प्रात:काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हों, सफेद तिल मिश्रित जल से स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा गृह में गणेश जी के समक्ष निम्न प्रकार से संकल्प करें‌ - ‘जब तक चन्द्रोदय नहीं होगा, मैं निराहार रहूँगा/ रहूँगी । पहले गणेश पूजन करके तभी भोजन ग्रहण करूगी/ करूँगा।’
इसके बाद शाम के समय मिट्टी अथवा धातु (सोने, चांदी, ताम्बे) के कलश में जल भरकर पूजा स्थल पर रखें । उस पर लाल वस्त्र बिछायें। उसके ऊपर अक्षत अथवा रोली से अष्टदल कमल की आकृति बनावें और उस पर गणेश जी की मूर्ति की स्थापना करें। तत्पश्चात षोडशोपचार विधि से भक्ति पूर्वक पूजन करें। पूजन के साथ निम्न बातों का उच्चारण करें-
- हे लम्बोदर! चार भुजा वाले! तीन नीत्र वाले! लाल रंग वाले! हे नील वर्ण वाल! शोभा के भण्डार! प्रसन्न मुख वाले गणेश जी! मैं आपका ध्यान करता/करती हूँ । मैं आपका आवाहन करता/करती हूँ । हे विघ्नराज ! मैं आपको प्रणाम करता/करती हूँ, यह आसन है। हे लम्बोदर! यह आपके लिये पाद्य है, हे शंकरसुवन! यह आपके लिये अर्घ्य है। हे उमापुत्र! यह आपके स्नानार्थ जल है। हे वक्रतुण्ड! यह आपके लिए आचमनीय जल है। हे शूर्पकर्ण! यह आपके लिए वस्त्र है। हे कुब्जे! यह आपके लिए यज्ञोपवीत है । हे गणेश्वर! यह आपके लिए रोली, चंदन है। हे विघ्नविनाशन! यह आपके लिए फूल है। हे विकट! यह आपके लिए धूपबत्ती है। हे वामन! यह आपके लिए दीपक है। हे सर्वदेव! यह आपके लिए लड्डु का नैवेद्य है। हे सर्वार्त्तिनाशन देव! यह आपके निमित्त फल है। हे विघ्नहर्ता! यह आपके निमित्त मेरा प्रणाम है। प्रणाम करने के बाद क्षमा प्रार्थना करें। इस प्रकार षोडशोपचार रीति से पूजन करके नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थों को बनाकर भगवान को भोग लगावें।

शुद्ध देशी घी के पंद्रह लड्डु बनावें। भगवान को लड्डु अर्पित करके उसमें से पाँच ब्राह्मण को दे दें, उसके साथ दक्षिणा भी दें । चन्द्रोदय होने पर पहले चतुर्थी तिथि के निमित्त अर्घ्य दें। भक्तिभाव से अर्घ्य देवें। चतुर्थी को अर्घ्य देते हुये निम्न प्रकार से प्रार्थना करें- “हे देवी! तुम सब तिथियों में सर्वोत्तम हो, गणेश जी की परम प्रियतमा हो। हे चतुर्थी हमारे प्रदत्त अर्घ्य को ग्रहण करो, तुम्हें प्रणाम है।” इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करें - “क्षीरसागर से उत्पन्न हे लक्ष्मी के भाई! हे निशाकर! रोहिणी सहित हे शशि! मेरे दिये हुये अर्घ्य को ग्रहण किजिये।” तत्पश्चात, गणेश जी को प्रणाम करते हुये निम्न प्रकार से कहें- “हे लम्बोदर! आप सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करनेवाले हैं आपको प्रणाम है । हे समस्त विघ्नों के नाशक! आप मेरी अभिलाषाओं को पूर्ण करें।” तत्पश्चात ब्राह्मण को हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-“ हे द्वीजराज! आपको नमस्कार है, आप साक्षात देवस्वरूप है। गणेशजी की प्रसन्नता के लिए हम आपको लड्डु समर्पित कर रहे हैं। आप हमारा उद्धार करने के लिए दक्षिणा सहित इन पाँच लड्डुओं को स्वीकार करें। हम आपको नमस्कार करते हैं।” इसके बाद ब्राह्मण भोजन करवायें । यदि सामर्थ्य ना हो तो अन्न तथा दक्षिणा प्रदान करें।
अब गणेश जी से प्रार्थना करें। प्रार्थना करके मूर्ति का विसर्जन करें। हाथ में अक्षत लेकर इस प्रकार बोलते हुये विसर्जन करें- ‘हे देवों में श्रेष्ठ! गणेश जी! आप अपने स्थान को प्रस्थान किजिए एवं इस व्रत पूजा के फल को दिजिए।’ विसर्जन के बाद, अपने गुरु को अन्न-वस्त्रादि एवं दक्षिणा के साथ गणेश जी की मूर्ति दे देवें।

श्रावण- अंगारकी चतुर्थी व्रत कथा

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अंगारकी चतुर्थी पूजा विधि - विधि विधान से (Angarki chaturthee worship method (Step by Step)

पूजन सामग्री
1. गणेश जी की प्रतिमा 2. धूप 3. दीप 4. नैवेद्य(लड्डु तथा अन्य ऋतुफल) 5. अक्षत 6. फूल 7. कलश 8. चंदन केसरिया 9. रोली 10. कपूर 11. दुर्वा 11. पंचमेवा 12. गंगाजल 13. वस्त्र (2 – एक कलश के लिये- एक गणेश जी के लिये) 14. अक्षत 15. घी 16. पान 17. सुपारी 18. लौंग 19. इलायची 20. गुड़ 21. पंचामृत (कच्चा दूध, दही,शहद, शर्करा, घी)

ध्यानं –
दोनो हाथ जोड़कर हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें ।

उपर लिखे हुए मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प श्री गणेश जी के चरणों में छोड़ दें ।

आवाहनं:-

हाथ में चावल लेकर दिये गये मंत्र को पढ़ते हुए श्री ग़णेश जी के चरणों मे चावल छोड़ दें

आसनं:-
दाएँ हाथ मे पुष्प लें और दिये गये मंत्र का उच्चारण करते हुए

पुष्प गणेश जी पर छोड़ दें ।

पाद्यं:-
पंचपात्र में से एक चम्मच जल लेकर मंत्र का उच्चारण करें -

और यह जल मूर्ति के आगे या गणेश जी को समर्पित करें ।

अर्घ्यं-
एक अर्घा में गंध, अक्षत, पुष्प लेकर दिये हुए मंत्र को बोलते हुए -

अर्घ्य मूर्ति के आगे अथवा गणेश जी को समर्पित करें ।

आचमनं-
चम्मच में थोड़ा जल लेकर दिये हुए मंत्र को बोलते हुए -

यह जल श्री गणेश जी के चरणों मे छोड़ दें ।

स्नानं-
श्री गणेश जी के मूर्ति को को गंगाजल से स्नान करवाएं। एक पात्र में जल लेकर दिये हुए मंत्र को बोलते हुए –

स्नान के लिये श्री गणेश जी को जल समर्पित करें। फिर आचमन के लिये पुन: जल समर्पित करें ।

पंचामृत स्नानं-
एक पात्र में दूध, दही, घी, शहद, शर्करा (शक्कर) मिलाकर पंचामृत बनायें। अब इस पंचामृत को चम्मच में लेकर श्री गणेश जी को स्नान करायें और साथ मे मंत्र का उच्चारण करें ।

शुद्धोदक-स्नान
अब शुद्ध जल लेकर दिये हुए मंत्र को बोलते हुए

शुद्ध जल से स्नान करायें।

वस्त्र
(वस्त्र ना हो तो मौली तोड़कर) हाथ में ले तथा मंत्र पढ़ते हुए

वस्त्र समर्पित करें । आचमन के लिये जल समर्पित करें ।

उपवस्त्रं-
मौली तोड़कर हाथ में ले तथा मंत्र बोलते हुए श्री गणेश जी को उपवस्त्र समर्पित करें ।

आचमन के लिये जल समर्पित करें

यज्ञोपवीतं
यज्ञोपवीत हाथ में ले तथा मंत्र बोलते हुए श्री गणेश जी को समर्पित करें ।

आचमन के लिये जल समर्पित करें

गंधं-

एक पात्र में चंदन लें ।

अनामिका अंगुली (दाएं हाथ की छोटी अंगुली के साथ वाली अंगुली ) से चंदन श्री गणेश जी को अर्पित करें ।

सिंदूरं-
हाथ मे सिंदूर की डिब्बी लें ।

श्री गणेश जी को सिंदूर समर्पित करें ।

कुंकुमं (अबीर) -

एक पात्र में कुंकुम (गुलाल) लें ।

श्री गणेश जी को कुंकुम समर्पित करें|

अक्षतं-
हाथ में साबुत चावल और थोड़ा चंदन लेकर मिलाएं।

श्री गणेश जी को अक्षत समर्पित करें ।

पुष्पं-
पुष्प हाथ में लें । मंत्र का उच्चारण करें -

पुष्प खड़े होकर समर्पित करना चाहिये ।

पुष्पमाला –
दोनों हाथों में पुष्पमाला लें । मंत्र का उच्चारण करें -

पुष्पमाला श्री गणेश जी को समर्पित करें ।

दूर्वादलं (दूब की गुच्छी)-
हाथ में दुर्वा लें । मंत्र का उच्चारण करते हुए श्री गणेश जी को दुर्वा समर्पित करें ।

धूपं-
धूप जला कर धूप तैयार करें ।

श्री गणेश जी को धूप समर्पित करें ।

दीपं—
श्री गणेश जी को दीपक मंगल कामना के साथ समर्पित करें ।

अब आप शुद्ध जल से हाथ धो लें ।

नैवैद्यम्-
हाथ में लड्डु का पात्र लें तथा मंत्र उचारण कर श्री गणेश जी को समर्पित करें ।

भोग अर्पित करके एक-एक चम्मच जल पाँच बार श्री गणेश जी को समर्पित करते हुए मंत्र बोलें।
1. ॐ प्राणाय स्वाहा
2. ॐ अपानाय स्वाहा
3. ॐ व्यानाय स्वाहा
4. ॐ उदानाय स्वाहा
5. ॐ समानाय स्वाहा
अब श्री गणेश जी को आचमन करायें ।

आचमनं-
चम्मच में जल ले कर मुख शुद्धि के लिये जल समर्पित करें ।

ऋतुफलं –
मंत्र के साथ, फल समर्पित करें तथा आचमन के लिये जल समर्पित करें ।

अखंड ऋतुफलं-
अखण्ड ऋतुफल (पंचमेवा) अर्पित करें तथा आचमन के लिये जल समर्पित करें।

ताम्बूलं (पूंगीफल)
ताम्बूल (पान के पत्ते) को उल्टा करके उस पर लौंग, इलायची, सुपारी एवं कुछ मीठा रखें। दो ताम्बूल बनायें। मंत्र के साथ श्री गणेश जी मुख शुद्धि के लिये ताम्बूल अर्पित करें|

द्र्व्यदक्षिणां-

श्रद्धानुसार पैसा- रूपया हाथ में लेकर मंत्र उच्चारण के साथ श्री गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करें ।

प्रार्थनां:- श्री गणेश
दोनों हाथ जोड़कर श्री गणेश जी को नमस्कार करते हुए मंत्र का उच्चारण करें -

चंद्रमा पूजन:-
चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। कथा सुनने के बाद आरती करें ।

श्रावण- अंगारकी चतुर्थी व्रत कथा

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