गोवत्स द्वादशी या बछवाड़ा व्रत विधि एवं कथा - Govats_dwadashi Vrat Vidhi and Katha in Hindi

कार्तिककृष्ण पक्ष द्वादशी को गाय और बछड़े की पूजा की जाती है । इस व्रत को गोवत्स द्वादशी या बछवाड़ा भी कहा जाता है । कई जगहों पर इसे बछवाँछ या वछ्वाँस भी कहते है अर्थात वत्सवंश ।अलग-अलग स्थानों पर इस व्रत का नाम अलग-अलग है । यह व्रत पुत्रवती महिलायें करती है और गाय तथा बछड़े की पूजा करके अपने पुत्र की कुशल मंगल की कामना करती है। इस वर्ष यह व्रत १६ अक्टूबर ,२०१७ (सोमवार) को है । ऐसा मानाजाता है कि इसी तिथि को कृष्ण भगवान पहली बार गायों को लेकर चराने को गये थे और उनके सकुशल लौट आने पर माँ यशोदा ने सभी गाय और बछड़े की पूजा की थी, तभी से इस व्रत का प्रचलन है।
यह व्रत कहीं-कहीं पर ही होता है । कई जगहों पर यह पूजा हर तीसरे मास में की जाती है अर्थात् कार्तिक, माघ, वैशाख और सावन के प्रत्येक कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन।

गोवत्स द्वादशी या बछवाड़ा व्रत पूजन सामग्री:- (Puja Saamagree for Govats_dwadashi Vrat)

•आटे से बनी हुई गाय तथा बछड़ा
• धूप
• दीप
• चंदन
• रोली
• नैवेद्य (बेसन के अठवाई)
• अक्षत( काकुन के चावल का)

गोवत्स द्वादशी या बछवाड़ा व्रत की विधि (Puja Method Of Govats_dwadashi)

इस व्रत में पुत्रवती महिलायें पूरे दिन व्रत रखती है । शाम को जब गायें चरकर घर को लौटती है , तब गाय तथा बछड़े की पूजा की जाती है । सुबह के समय व्रत करने वाली महिलायें नदी या तालाब में जा कर स्नान करें । घर आकर आटे की लोई से आंगन में गाय तथा बछड़े की मूर्ति बनाती है । आटे की बनी हुई गाय तथा बछड़े की पूजा धूप, दीप, रोली, अक्षत, चंदन के द्वारा की जाती है । शाम होने से पहले पूरे घर को गोबर से लीप कर आंगन में चौक (अल्पना /रंगोली) बनायी जाती है । शाम को जब गाय-बछड़े चरकर वापस घर को आती है, तब उनकी पूजा की जाती है । गाय तथा बछड़े को चौक पर खड़ा किया जाता है । उसके बाद महिलायें धूप, दीप , अक्षत, चंदन एवं नैवेद्य से गाय-बछड़े की पूजा करती है । पूजा के बाद हाथ जोड़कर अपने पुत्रों के कुशल मंगल की कामना करती है, और मन-ही-मन गाय से विनती करती है कि हे गाय माता जैसे आप अपने बछड़े की रक्षा करती हो उसी प्रकार मेरे पुत्र की भी रक्षा करना, उसे हर विपत्ति से बचा कर रखना । पूजा समाप्त कर गाय को नैवेद्य खिलाते हैं; उसके बाद सभी को प्रसाद देकर स्वयं भोजन करती हैं ।

पूजा में निषेध वस्तु :-

धान का चावल/गेहूं से बने पदार्थ नही खाते है।
गाय के दूध से बने सभी पदार्थ ( दूध, दही, नैवेद्य इत्यादि) नही खाते है।
पृथ्वी का गड़ा हुआ कोई भी अन्न नही खाते है।

शाम को व्रत के बाद भोजन सामग्री खाने हेतु :-

कोदो/काकुन(कौनी) का चावल खाते है।
चने की दाल खाते है।

कथा:-

ऐसी मान्यता है की कार्तिक कृष्ण पक्ष द्वादशी को हीं पहली बार भगवान श्री कृष्ण जी गाय को चराने गये थे। जब प्रात:काल भगवान श्री कृष्ण गायों –बछड़ों की साथ जाने लगे तब माता यशोदा से पहले सभी गायों की पूजा की उसके बाद श्री कृष्ण को तिलक लगा आरती कर उन्हें गायों के साथ विदा किया । माँ यशोदा का पूरा दिन अपने पुत्र के कुशल मंगल की कामना करते हुये भूखे-प्यासे व्यतीत हो गया। जब शाम को उन्होंने कृष्ण के बाँसुरी की आवाज सुनी दो प्रसन्न होकर घर आँगन को गोबर से लीपकर चौक बनाया । जब श्री कृष्ण गायों के साथ घर आ गये तब उन गायों-बछड़ों को चौक के ऊपर खड़ा कर विधिवत पूजा की तथा प्रार्थना की – “हे गौ माता! जिस प्रकार आज तुम मेरे पुत्र को सकुशल ले कर लौट आई हो, इसी प्रकार हमेशा मेरे पुत्र की अपने बछड़ों के समान रक्षा करना ।” उसके बाद श्री कृष्ण को खिलाकर स्वयं भोजन किया, तभी से इस व्रत का प्रचलन शुरु हुआ।