श्री वृन्दावन धाम का श्रीबाँकेबिहारी मन्दिर सम्पूर्ण दुनिया में प्रसिद्ध है। बाँके का मतलब होता है टेढ़ा और बिहारी का मतलब बिहार करने वाला। बाँकेबिहारी जी की सेवा एक बालक की तरह की जाती है। बाँके बिहारीजी की सेवा पद्धति की एक अलग ही निराली शैली है। यहाँ प्रत्येक उत्सव बड़े धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है। बाँकेबिहारीजी का श्रृंगार पर्वों के अनुसार ही किया जाता है। उत्सवों के अवसर पर फ़ूलों आदि से मन्दिर सजाया जाता है। यहाँ केवल राधा नाम की ही रट लगी रहती है “राधे राधे”। मन्दिर में प्रवेश करते ही अन्तः करण में एक दिव्य अनुभव होता है। बिहारीजी के नेत्र सभी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक बार जो श्री बाँकेबिहारी के दर्शन करता है, वो उन्हीं का होकर रह जाता है।

प्रातःकालीन दर्शन समय :- गर्मी - होली के बाद दौज से (07.55 a.m to 11.55 a.m) सर्दी - दिवाली के बाद दौज से (08.55 a.m to 12.55 p.m)

श्रृंगार आरती :- गर्मी - होली के बाद दौज से (07.55 a.m) सर्दी - दिवाली के बाद दौज से (08.55 a.m)

राजभोग आरती :- गर्मी - होली के बाद दौज से (11.55 a.m) सर्दी - दिवाली के बाद दौज से (12.55 p.m)

सायंकालीन दर्शन समय :- गर्मी - होली के बाद दौज से (05.30 p.m to 09.30 p.m) सर्दी - दिवाली के बाद दौज से (04.30 p.m to 08.30 p.m)

शयन भोग आरती :- गर्मी - होली के बाद दौज से (09.30 p.m) सर्दी - दिवाली के बाद दौज से (08.30 p.m)

कैसे पहुचे? How to reach Vrindavan?

सड़क से (By Road): वृन्दावन दिल्ली-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग सं० 2 पर स्थित है। बहुत सारी बसें दिल्ली, आगरा और मथुरा आदि के बीच चलती रहती हैं। बाँके बिहारी मन्दिर राष्टीय राजमार्ग पर स्थित छटीकरा गाँव से 6 किमी० दूर है। कई सारे टेम्पो मन्दिर के लिये हर समय उपलब्ध रहते हैं। मथुरा से वृन्दावन की दूरी 12 किमी० है। मथुरा से वृन्दावन बस, टेम्पो आदि से आराम से आया जा सकता है।
ट्रेन से (By Train) : वृन्दावन का नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन मथुरा है। जो कि दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-चेन्नई लाइन पर अवस्थित है। देश के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुम्बई, पुणे, चेन्नई, बैंगलोर, हैदराबाद, कोलकाता, ग्वालियर, देहरादून, इंदौर, आगरा आदि से कई सारी रेलगाड़ी मथुरा आती हैं।
हवाई जहाज से (By Aeroplane): समीपवर्ती हवाई अड्डा आगरा है जो कि वृन्दावन से 67 किमी० है। नजदीकी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली है। दिल्ली और वृन्दावन के मध्य पवन हंस की हैलीकाप्टर सेवा भी उपलब्ध है।

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वृन्दावन के होटल, गेस्ट हाउसेस और आश्रम की जानकारी

बाँके बिहारी जी

श्री बाँके बिहारी जी महाराज के दर्शन तो भक्तों ने जरूर किये होंगे। जब आप मन्दिर के विशाल चौक में प्रवेश करते हैं तो ऊँचे जगमोहन के पीछे निर्मित गर्भग्रह में भव्य सिंहासन पर विराजमान श्रीबिहारीजी के आपको दर्शन होते हैं। विभिन्न उत्सवों के अवसर पर और ग्रीष्म ऋतु में (कामदा एकादशी से श्रावण की हरियाली अमावस्या तक) बांके बिहारी जी के फ़ूल-बंगले बनते हैं। श्रीबिहारीजी महाराज जगमोहन में अपने उत्कृष्ट साज श्रृंगार के साथ जगमोहन पर विराजते हुए अपने भक्तों को दर्शन देते हैं तथा सभी उनकी मनोकामनाओं को पूरी करते हैं
मेरे साथ आप भी अपने मन की आँखों से एक बार पुनः बाँकेबिहारीजी महाराज के दर्शन कीजिये । श्रीबिहारीजी महाराज सिंहासन पर बीचोबीच विराजमान हैं । उनके वाम अंग में उनकी परम दुलारी प्रियतमा श्री श्यामा प्यारी की गद्दी है तथा उन्ही के बगल में छोटे से चित्र पट के रूप में विराजमान हैं बिहारी जी के परम भक्त श्री स्वामी हरिदास जी!

श्रीस्वामी हरिदासजी की जानकारी:‌-

श्री स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1535 वि. में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को हरिदासपुर नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता प्रसिद्ध रसिक शिरोमणि श्री आशुधीरजी महाराज थे और उनकी माता का नाम श्रीमती गंगा देवी था। ये सारस्वत ब्राह्मण थे । इनका परिवार मूलत: पंजाब के मुल्तान प्रदेश का निवासी था, परंतु ब्रज-प्रेम के वशीभूत होकर आशुधीरजी महाराज कोल (ब्रज की ओर) आकर बस गये थे। वहीं श्री स्वामी हरिदास जी का जन्म हुआ और उन्हीं के नाम पर उस परम पवित्र स्थान का नाम “हरिदासपुर” प्रसिद्ध हुआ। यह वर्तमान में अलीगढ़ से 3 मील खैर मार्ग पर अवस्थित है । इनके भाइयों का नाम श्रीजगन्नाथ जी एवं श्री गोविंद जी था।
श्री स्वामी हरिदास जी अपने घर पर 25 वर्ष तक रहे। उनका विवाह एक ब्राह्मण कन्या से हुआ। ऐसी कथा प्रचलित है कि जब स्वामी हरिदास जी की पत्नी उनके दर्शन के लिये आई, तभी दीपक की लौ से उनका शरी छू गया और वे प्रकाश रूपी होकर श्री स्वामी हरिदासजी के चरणों में विलीन हो गयी । यह एक विलक्षण घटना थी । श्रीस्वामी लालदास जी ने लिखा है –
रवनि, रसायन परिहरि साह न मानत कौन ।
आसू के हरिदास की लगै ‘लाल’ पग पौन ॥
25 वर्ष की आयु में श्रीस्वामी हरिदासजी ने अपने पूज्य पिता श्रीआशुधीर जी महाराज से दीक्षा ली और सब कुछ त्याग कर श्री वृन्दावन धाम के परम रमणीय़ ‘निधिवन’ नामक नित्य विहार की भूमि में आकर निवास करने लगे। उस समय अर्थात् संवत 1560 वि. में श्रीधाम वृन्दावन एक घना वन था। उनके साथ उनके भतीजे बीठलविपुल जी भी थे।
श्रीस्वामी हरिदासजी ने वृन्दावन में परम विलक्षण रस-रीति का प्रवर्तन किया और यहीं निवास किया। श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज नित्य-निकुँज लीलाओं में ललिता स्वरूप हैं। वे नित्यविहार के नित्य समुद्र में रसमग्न रहकर प्रिया-प्रियतम से साक्षात्कार करते हुए उन्हीं की केलियों का गान करते हुए अपना समय बीताते थे । स्वामी जी के द्वारा तानपुरे पर संगीत की आलौकिक स्वर लहरियाँ के साथ सम्पूर्ण वृन्दावन थिरकने लगता था, और सभी पशु-पक्षी मंत्र मुग्ध होकर उनके संगीत की अलौकिक छटा में खो जाते थे। उनके भतीजे के मन में हमेशा एक कौतुहल होता था कि श्री स्वामी हरिदास जी का संगीत किसके लिये समर्पित है और वे किससे एकांत में बातें करते हैं।
एक दिन स्वामी हरिदासजी ने बीठलविपुल जी के कौतुहलको शांत करने के लिये अपने पास बुलाया और कहा – “आज तुम्हारे जन्मदिन पर मैं तुम्हें एक उपहार देना चाहता हूँ ”
बीठलविपुल जी बोले – “ यदि आप मुझे कोई उपहार देना चाहते है तो उपहार के रूप में आप मुझे अपने प्राणाराध्य श्यामा-कुंजबिहारी के स्वरूप की एक झलक दिखा दिजिये एवं निकुंज द्वार का रहस्य प्रकट किजिये।”
स्वामी जी बोले – “वही उपहार तो मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। जाओ जगन्नाथ जी के साथ अन्य सभी को बुला लाओ ।”

यह सुनकर बीठलविपुल जी हरिदास जी के भाई और समस्त उपस्थित जन समूह को लेकर आ गये। स्वामी हरिदास जी ने तानपुरे में आँखे बंद कर मधुर संगीत बजाना शुरु किया। सभी उपस्थित जन उस संगीत के रस में मग्न हो गये और संगीत के लहरों के साथ ही अपने अंदर एक अलौकिक प्रकाश का अनुभव किया। उसी क्षण उस स्थान पर नील-गौर-प्रकाश के रूप में श्री बिहारी जी महाराज प्रकट हुए। अनंत रूप-राशि-उज्जवलतम प्रभा सौंदर्य जगमगा रहा था ।प्रिया-प्रियतम के उस अपूर्व रूप का दर्शन कर उपस्थित जन धन्य हो गये। स्वामी हरिदास जी मंत्रमुग्ध हो कर गाने लगे –
माई री सहज जोरी प्रकट भई जु रंग की गौर श्याम घन-दामिनि जैसें।
प्रथम हूँ हुती, अबहूँ आगे हूँ रहिहै, न टरिहै तैसें॥
अंग-अंग की उजराई, सुघराई, चतुराई, सुन्दरता ऐसें।
श्री हरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजविहारी सम वैस वैसे॥
गान समाप्त होते ही श्री श्यामा-कुंजबिहारीजी स्वामी हरिदास जी से बोले – “अब हम यहाँ इसी रूप में अवस्थित रहेंगे। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हुई। ।”
स्वामी हरिदास जी बोले – “हे मेरे आराध्य देव! हे प्राणाराध्य, आप ऐसे ही…….। कृपया कर के अपनी सेवा का विधान बतायें जिससे निकुंज के बाहर आपकी सेवा की जाये? ।”
श्री बिहारीजी ने कहा– “मेरी सेवा तो केवल लाड़ प्यार से हीं होगी।”
तभी स्वामी हरिदास जी ने निवेदन किया, ” आपके सौंदर्य को लोक सहन नहीं कर पायेगा। अतः आप एक ही रूप में प्रकाशित होकर दर्शन दें।” तभी श्यामा-कुंजबिहारी की युगल छवि बाँकेबिहारीजी के रूप में अवतरित हो कर प्रतिष्ठित हो गयी।
श्रीजगन्नाथ जी महाराज को श्री बाँकेबिहारीजी की सेवा का दायित्व स्वयं श्री स्वामी हरिदास जी महाराज ने सौंपा था। स्वामीजी ने बिहारीजी की तीन आरतियों का क्रम निर्धारित किया था-सुबह श्रृंगार आरती, मध्याह्नर राजभोग आरती और रात को शयन भोग आरती। उन्होंने श्रीबिहारी जी को अपने प्राणों से अधिक लाड़ लड़ाया । और तभी से जगन्नाथ जी के वंशज श्रीबिहारीजी की परम्परा से सेवा करते आ रहे हैं।
सन् 1864 से पहले तक श्रीबिहारी जी की सेवा का क्रम निधिवन में ही चलता रहा। उसके बाद उन्हें बांकेबिहारीजी के भव्य मन्दिर में स्थानान्तरित कर दिया गया, जहाँ वे आज विराजमान हैं। इस मन्दिर का निर्माण गोस्वामियों के सहयोग के द्वारा किया गया।
श्रीबिहारीजी महाराज तो स्वयं रस के सागर हैं। प्रिया-प्रियतम और सहचारियाँ हीं नित्य वृन्दावन के रसभोक्ता और्रसप्रदाता हैं। उनकी लीलाओं मे कथमपि निमित्त नहीं हैं, वे नित्य हैं बिहारीजी की उपासना प्रेम रस की उपासना है। सभी मतों के अनुयायी अपने हृदय में प्रेम रस को भर कर बिहारीजी के दर्शन हेतु यहाँ आते हैं और अपनी मनवांछित फल को प्राप्त करते हैं। श्रीबिहारीजी आज भी अपने नित्य लीला में रत होकर इस श्रीवृन्दावन धाम में मौजूद हैं । ये ना तो निर्गुण हैं, न सगुण अपितु दोनों से विलक्षण हैं। स्वामीजी कहते हैं- “मीत भले पाए बिहारी, ऐसे पावौ सब कोऊ।” इनको पाने के बाद सभी भेद मिट जाते हैं और कुछ भी पाने की इच्छाअ नहीं रह जाती । “बाँके की बाँकी झाँकी करि बाकी रही कहा है?”
श्रीबाँकेबिहारी की इस छवि के दर्शन अपने मन की आँखों के द्वारा किजिये। एक्रागचित होकर दर्शन करिये! सिर पर टेढ़ी मुकुट धारण किये हुए, टिपारे-कटारे-किरीट की शोभा है के साथ ललाट पर बिन्दी ,नाक में बेसर और कटि में पटका सजा हुआ है,। घुमावदार लहँगा और पायजामा के साथ पीठ पीछे इकलाई भी सजी है है। श्यामा जी के श्रृंगार के साथ श्याम जी का साज भी है। । विलक्षण रसिक प्रेमी भक्त को हीं श्यामा जी के वस्त्राभूषणों के अलावा उनके स्वरूप का दर्शन हो पाता है। बाँके बिहारी जी के कृपासे करोड में एक भक्त को श्यामजी की स्वरूप का दर्शन श्रीबाँकेबिहारीजी के स्वरूप से झाँकता हुआ दिखाई देता है। इसलिए कहा गया है –
कूँची नित्यविहार की, श्रीहरिदासी के हाथ। सेवत साधक सिद्ध सब, जाँचत नावत माथ॥

श्री बाँके बिहारी जी की विशेष सेवायें

पोशाक सेवा
छप्पन भोग एवं भण्डारा सेवा
दैनिक भोग
इत्र सेवा
तुलसी - चन्दन सेवा
दीपक सेवा
पुष्प की बैठक निज महल में प्रात:
गुलाब जल सेवा
बाल भोग सेवा
राज भोग सेवा
श्रृंगार सेवा
प्रसाद वितरण
फूल बंगला सेवा

ब्रज धाम

रज समुद्र मथुरा कमल, वृन्दावन मकरंद। व्रजबनिता सब पुष्प हैं, मधुकर गोकुलचंद॥ समस्त क्रियाओं के कर्ता, भोक्ता , साक्षी और चराचर जगत की आत्मा श्री कृष्ण प्रकृति के एक मात्र अधीश्वर हैं । वे अन्तर्यामी सर्वव्यापक हैं । श्री कृष्ण जी महाराज का निज धाम है ब्रज धाम, जहाँउन्होंने अपनी बाल –लीलायें की थी और वही ब्रज धाम उनकी प्राणेश्वरी राधा जी का हृदय है। सभी धामों से अलग ब्रज मण्डल का अपना एक अनूठा महत्व है। भगवान श्री कृष्ण के भक्ति रस को जो अनुपम छटा ब्रज धाम में प्रवाहित है उसकी तुलना सारे विश्व में नहीं की जा सकती है। यह भक्ति रस भगवान श्री कृष्ण के द्वारा प्रवाहित की गई है। भक्ति रस में डूबी ब्रज रस की माधुरी अनुपम है। भगवान श्री कृष्ण ने अतुलनीय रस की मधुरतम धारा को ब्रज में प्रवाहित किया है। जिस प्रभु के दर्शन पाने के लिये बड़े-बड़े ज्ञानी, योगी, ऋषि मुनि, देवगण सहस्त्र वर्ष तक तप करते हैं उनका दर्शन इस ब्रज की पवित्र वसुंधरा पर सहज हीं हो जाता है।
ब्रज भूमि को भक्तों ने बैकुण्ठ से भी सर्वोपरि माना है। यही वह भूमि है, जहाँ पर श्रीकृष्ण जी ने अपनी बाल लीलाओं का पान अपने समस्त भक्तजनों को कराया था। आज भी इस भूमि में श्रीकृष्णजी की बांसुरी के ही स्वर सुनाई देते हैं और कुछ नहीं ।यहाँ आकर भक्त जन अपने प्यारे प्रभु की लीलाओं का दर्शन तथा उनके बाँसुरी के मधुर स्वर का श्रवण करते हैं। यहीं तो श्रीकृष्णजी ने अपनी छोटे –छोटे हाथों से माखन चुराया,गोपियों की मटकी फोड़ी, गोपिकाओं से हास-परिहास किया, ग्वालवालों के साथ नित्य नयी खेल-लीलाओं की, बड़ी चपलता से गोपियों का मार्ग रोका, यमुना किनारे कदम्ब वृक्ष के ऊपर बैठकर बंशी बजाया और सभी गोपियों को अपनी ओर खींचा । यहाँ की सभी हर गली-रास्ते बहुत ही भाग्यशाली हैं क्योंकि यहीं प्यारे श्याम सुन्दर का किसी लता में पीताम्बर उलझा तो यहीं किसी निकुँज में श्यामाजू का आँचल उलझा। प्रभु श्री श्याम सुन्दर की सभी लीलायें सभी रसिकजनों सन्तों, भक्तों को आनन्द प्रदान करती हैं।
यहाँ के कण-कण में राधा-कृष्ण की छवि है, दिशाओं में भगवद नाम की झलक, हरपल कानों में राधे-राधे की झलक हैं। देवलोक भी इस लोक के सामने फीका है। यहाँ का हर वृक्ष देव है तो लता देवांगना। यहाँ उन्होने ग्वाल बालों के साथ क्रीड़ा, गौ चराया, माखन चोरी की, कालिया का दमन किया हैं। यहाँ के हर नगर, गाँव, कुण्ड, घाट आदि स्थलों का नामकरण भगवान कृष्ण की लीलाओं पर ही हुआ है।