श्री बाँके बिहारी- विनय-पचासा

॥ दोहा ॥
बाँकी चितवन कटि लचक, बाँके चरन रसाल ।
स्वामी श्री हरिदास के बाँके बिहारी लाल ॥
॥चौपाई ॥
जय-जय-जय श्रीबाँके बिहारी ।हम आये हैं शरण तिहारी ॥१॥
स्वामी श्री हरिदास के प्यारे । भक्तजनन के निर रखवारे ॥२॥
श्याम स्वरूप मधुर मुसकाते । बड़े- बड़े नैन बरसाते ॥३॥
पटका पाग पीताम्बर शोभा । सिर सिरपेच देख मन लोभा ॥४॥
तिरछी पाग मोती लर बाँकी । सीस टिपारे सुन्दर झाँकी ॥५॥
मोर पंख की लटक निराली ।कानन कुण्डल लट घुँघराली ॥६॥
नथ बुलाक पै तन मन वारी । मंद हसन लागै अति प्यारी ॥७॥
तिरछी ग्रीव कण्ठ मनि माला । उर पै गुंजा हार रसाला ॥८॥
काँधे साजे सुन्दर पटका । गोटा किरन मोतिन के लटका ॥९॥
भुज में पहिर अंगरखा झीनी । कटि काछिनी अंग ढ़क लीनी ॥१०॥
कमर-बंध की लटकन न्यारी । चरन छुपाये श्रीबाँकेबिहारी ॥११॥
इकलाई पीछे ते आई । दूनी शोभा दई बढ़ाई ॥१२ ॥
गादी सेवा पास विराजै । श्रीहरिदास छवी अति राजै ॥१३॥
घंटी बाजे बजत न आगै । झोंकी परदा पुनि-पुनि लागै ॥१४॥
सोने-चाँदी के सिंहासन । छत्र लगी मोती की लटकन ॥१५॥
बाँके तिरछे सुघर पुजारी । तिनकी हू छबि लागे प्यारी ॥१६॥
अतर फुलेल लगाय सिहावैं। गुलाब जल केशर बरसावैं ॥१७॥
दूध-भात नित भोग लगावें । छप्पन- भोग भोग में आवें ॥१८॥
मगसिर सुदी पंचमी आई । सो विहार पंचमी कहाई ॥१९ ॥
आई विहार पंचमी जबते । आनंद उत्सव होवें तबते ॥२०॥
बसन्त पाँचे साज बसन्ती । लगै गुलाल पोशाक बसन्ती ॥२१॥
होली – उत्सव रंग बरसावै । उड़त गुलाल कुमकुमा लावै ॥२२॥
फूल डोल बैठें पिय प्यारी । कुँज विहारिन कुंज बिहारी ॥२३॥
जुगल सरूप एक मूरत में । लखौ बिहारी जी सूरत में ॥२४॥
श्याम सरूप हैं बाँके बिहारी । अंग चमक श्री राधा प्यारी ॥२५॥
डोल –एकादशी डोल सजावै । फूले फूल छबी चमकावैं ॥२६॥
आखै तीज पै चरन दिखावें ।दूर-दूर के प्रेमी आवें ॥२७॥
गर्मिन भर फूलन के बँगला । पटका हार फूलन के झँगला ॥२८॥

शीतल भोग, फुहारे चलते । गोटा के पंखा नित झलते ॥२९॥
हरियाली तीजन कौ झूला । बड़ी भीड़ प्रेमी मन फूला ॥३०॥
जन्माष्टमी की मंगला आरती । सखी मुदित निज तन-मन वारती ॥३१॥
नन्द महोत्सव भीड़ अटूट । सवा प्रहर कंचन की लूट ॥३२॥
ललिता छट उत्सव सुखकारी । राधा अष्टमी की चाव सवारी ॥३३॥
शरद चाँदनी मुकट धरावैं । मुरलीधर के दर्शन पावैं ॥३४॥
दीप दिवारी हठरी दर्शन । निरखत सुख पावै प्रेमी मन ॥३५॥
मन्दिर होते उत्सव नित-नित । जीवनसफल करें प्रेमी चित ॥३६॥
जो कोई तुम्हें प्रेम ते ध्यावैं । सोई सुख मनवांछित फल पावें ॥३७॥
तुम हो दीनबन्धु ब्रज-नायक । मैं हूँ दीन सुनो सुखदायक ॥३८॥
मैं आयौ तेरे दवार भिखारी । कृपा करो श्रीबाँकेबिहारी ॥३९॥
दीन दु:खी के संकट हरते । भक्तन पै अनुकम्पा करते ॥४०॥
मैं हूँ सेवक नाथ तुम्हारो । बालक के अपराध बिसारो ॥४१॥
मोकूँ जग संकट ने घेरौ । तुम बिन कौन हरै दुख मेरौ ॥४२॥
विपदा ते प्रभु आप बचाऔ । कृपा करो मोकूँ अपनाऔ ॥४३॥
मै अज्ञान मंद-मति भारि । दया करो श्रीबाँकेबिहारी ॥४४॥
बाँके बिहारी विनय पचासा ।नित्य पढ़ै पावै निज आसा ॥४५॥
पढ़ै भाव ते नितप्रति गावैं । दुख दारिद्र निकट नहीं आवैं ॥४६॥
धन परिवार बढ़ै व्यापारा । सहज होय भव सागर पारा ॥४७॥
कलियुग के ठाकुर रंग राते । दूर-दूर के प्रेमी आते ॥४८॥
दर्शन कर निज हृदय सिहाते । अष्ट-सिद्धि नवनिधि सुख पाते ॥४९॥
मेरे सब दुख हरो दयाला । दूर करो माया जंजाला ॥५०॥
दया करो मोंकूँ अपनाऔ । कृपा- बिन्दु मन में बरसाऔ ॥५१॥
॥दोहा॥
ऐसौ मन कर देउ मैं , निरखूँ श्यामा-श्याम ।
प्रेम विन्दु दृग ते झरें, श्रीवृन्दावन विश्राम ॥
॥श्रीबाँकेबिहारी लाल की जय ॥