वैभव लक्ष्मी कथा क्रमश:.

फिर भी द्वार पर आये हुए अतिथि का आदर करना चाहिए, ऐसे आर्य धर्म के संस्कार वाली शीला ने खड़े होकर द्वार खोला। तो देखा एक माँ जी खड़ी थी। वे बड़ी उम्र की लगती थीं। किन्तु उनके चेहरे पर अलौकिक तेज दिख रहा था।उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था। उनके भव्य चेहरे से करुणा और प्यार छलकता था। उनको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। वैसे शीला इस माँ जी को पहचानती न थी, फिर भी उनको देखकर शीला के रोम-रोम में आनन्द छा गया। शीला माँ जी को आदर के साथ घर में ले आयी। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचा कर एक फटी हुई चादर पर उनको बिठाया।
माँ जी ने कहा: ‘क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं?’
शीला ने सकुचा कर कहा: ‘माँ! आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है। बहुत शांति हो रही है। ऐसा लगता है कि मैं बहुत दिनों से जिसे ढूढ़ रही थी वे आप ही हैं, पर मैं आपको पहचान नहीं पाई।’

Vaibhav Laxmi Katha Continue...

She understand that always welcome your guest, so, she open the door and saw there was an old lady. The lady’s had an amazing light at her face. It seems that a pious water flows from her eyes. Love & compassion present on her face. Sheela get an enormous peace to saw her. Although,Sheela didn’t recognized her, but sheela filled an amazing happiness to saw her. Sheela respectfully welcomed her inside house. There were nothing to offer her for sitting. So, Sheela told her with hesitation to sat on torn sheet.
Maa ji said- “Sheela! You didn’t recognize me?”
Sheela replied withg hesitation- “Maa! I am very haapy to see you.It gives me peace.It seems that You are such person whom, I had been searching since long time.But I could not recognize you. ”