श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी

आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी व्रत होता है। इस वर्ष यह व्रत २३ जुलाई (सोमवार), २०१८ को है। इस तिथि को भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा की जाती है । इसी व्रत के प्रभाव से माता देवकी और वसुदेव जी को श्रीकृष्ण जी पुत्र के रूप में प्राप्त हुये थे । इस व्रत को करनेवाले को अतुल वैभव की प्राप्ति होती है। वह इस लोक के सभी सुख भोगकर श्रीहरि के धाम को जाता है।

श्रीकृष्ण द्वादशी या वसुदेव द्वादशी पूजा सामग्री:-

श्रीकृष्ण जी की मूर्ति
कलश- 4
वस्त्र- 3
चौकी
पात्र- 4
तिल
धूप
दीप
अक्षत
चंदन
पुष्प
पुष्पमाला
नैवेद्य

श्रीकृष्ण द्वादशी व्रत विधि:-

आषाढ़ मास की दशमी तिथि को नियमपूर्वक भगवान श्री हरि का पूजन करें । उस समय पवित्र वस्त्र धारण कर विधिपूर्वक हवन करें । प्रसन्न मन से रहकर व्रती पुरुष को भली-भाँति सिद्ध किया हुआ हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये। फिर कम-से-कम पाँच पग दूर जाकर अपने पैर धोये। पुन: प्रात: काल उठकर शौच के बाद आठ अंगुलकी लम्बी दतुअन से मुख को शुद्ध करें । दतुअन के लिये किसी दूधवाले वृक्ष का लकड़ी उपयोग करे। इसके बाद विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। शरीर के नौ द्वार हैं, उन सभी द्वारों को स्पर्श कर फिर भगवान् जनार्दन का ध्यान करे। ध्यान का प्रकार यह है-

इस प्रकार कहकर दिनमें नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रि के समय देवाधिदेव भगवान नारायण के समीप बैठकर ‘ऊँ नमो नारायणाय’ इस मंत्र का जप कर व्रती को सो जाना चाहिये। फिर प्रात:काल होनेपर व्रती पुरुष समुद्रतक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाबपर जाकर अथवा घर पर सन्यमपूर्वक रहकर हाथ में पवित्र मिट्टी लेकर यह मंत्र पढ़े-

क्रमश:

इस प्रकार का विधान सम्पन्नकर मिट्टी और जल हाथमें ले अपने सिर पर लगाये। साथ ही शेष बची हुई मृतिका को तीन बार समस्त अंगों में लगाये । फिर उपर्युक्त वारुण मंत्र पढ़कर विधिपूर्वक स्नान करे। स्नान करने के पश्चात संध्या-तर्पण आदि नित्य-नियम सम्पन्न कर देवालय या फिर घर में बने पूजा गृह में जाये ।
सभी पूजन सामग्री एकत्रि कर लें। आसन पर बैठ जाये। हाथ में अक्षत,कुंकुम, रोली एवं पुष्प लेकर श्रीराम जी की निम्न मंत्रों से पूजन करें:-

क्रमश:

इसके बाद सामने चार जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उन कलशोंको मालाओं से अलंकृत कर उनपर तिल से भरे पात्र रखे । इन चार कलशों को चार समुद्र मानकर उनके मध्यभाग में एक चौकी को स्थापित करें। उस चौकी के ऊपर भगवान श्रीराम सहित लक्ष्मण जी की सुवर्ण की मूर्ति स्थापित करें। दो वस्त्र अर्पित करें । तत्पश्चात् पुष्प,चंदन एवं अर्घ्य आदि उपचारों से पूजा करे। द्वादशी की कथा सुने।भगवान् के सामने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूरी रात जागरण करे । प्रात:काल सुर्योदय होनेपर स्नान कर, पूजा करें । उसके बाद वह प्रतिमा और दक्षिणा ब्राह्मण को दे । उसके बाद भोजन करें।