सोमाष्टमी व्रत

शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को यदि सोमवार पड़े तो उस तिथि को सोमाष्टमी कहते हैं। यह व्रत इस वर्ष २३ अप्रैल, २०१८ (सोमवार) एवं १७ सितम्बर, २०१८ (सोमवार) को है। इस व्रत को करने वाला सभी सुख भोग कर अंत में शिवलोक को पाता है। व्रत करनेवाले को कभी भे शोक,दु:ख और भय का सामना नहीं करना पड़ता है।

व्रत विधि एवं महात्म्य:-

यह व्रत सर्वसम्मत, कल्याणप्रद एवं शिवलोक-प्रापक है। शुक्ल-पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन यदि सोमवार हो तो उस दिन उमासहित भगवान चंद्रचूड़ का पूजन करे। इस व्रत में ऐसी प्रतिमा की पूजा की जाती है, जिसके दक्षिण भाग शिवस्वरूप और वाम भाग उमास्वरूप हो। प्रात:काल स्नानादि नित्य कर्म से निवृत हो आसन पर बैठ जायें। उमासहित शिव की प्रतिमा की स्थापना करें। अनंतर विधिपूर्वक प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवायें। उसके बाद दक्षिण भाग में कर्पूरयुक्त चंदन का उपलेपन करे। श्वेत पुष्प शिवजी तथा रक्त पुष्प पार्वतीजी को चढ़ाये और घृत में पकाये गये नैवेद्य का भोग लगाये। पचीस प्रज्वलित दीपकों से उमासहित भगवान चंद्रचूड़ की आरती करे। उस दिन निराहार रहें। अगले दिन प्रात: इसी प्रकार पूजन सम्पन्न कर तिल तथा घी से हवन करें।तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराये। यथाशक्ति सपत्नी ब्राह्मण की पूजा करे और पितरों का भी अर्चन करे। एक वर्षतक इस प्रकार व्रत करके एक त्रिकोण तथा दूसरा चतुष्कोण(चौकोर) मण्डल बनाये। तदनंतर विधिपूर्वक पार्वती एवं शंकरकी पूजा करें।उसके बाद श्वेत एवं पीत वस्त्र के दो वितान, पताका, घण्टा, धूपदानी, दीपमाला आदि पूजन के उपकरण ब्राह्मण को समर्पित करे और यथाशक्ति भोजन भी कराये। ब्राह्मण-दम्पत्ति को वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि से पूजन कर पचीस प्रज्वलित दीपकों से धीरे-धीरे नीराजन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पाँच वर्षों तक या एक वर्ष ही व्रत करने से व्रती उमासहितशिवलोक में निवास करता है और अनामय पद प्राप्त करता है। जो पुरुष आजीवन इस व्रत को करता है,वह तो साक्षात विष्णुरूप ही हो जाता है। उसके समीप आपत्ति, शोक, ज्वर आदि कभी नहीं आते।

॥ इति ॥