प्रदोष व्रत उद्यापन विधि:-

कोई भी व्रत बिना उद्यापन के पूर्ण नहीं माना जाता। प्रत्येक व्रत का समापन उद्यापन के द्वारा करने से हीं व्रत पूर्ण माना जाता है। ऐसे तो प्रदोष व्रत का उद्यापन ग्यारह त्रयोदशी अथवा २६ त्रयोदशी के व्रत के उपरांत उद्यापन करना चाहिये। कार्तिक मास आनेपर शनिवार के दिन यदि पूरी त्रयोदशी हो तो वह प्रदोष व्रत के उद्यापन के लिये अति उत्तम मानी गयी है।

पूजन सामग्री:-

∗ चांदी का वृषभ(नंदी)- , ∗ शिव-पार्वती का विग्रह (स्वर्ण की अथवा सामर्थ्यानुसार), ∗ ताँबे का पात्र (सिंहासन के रूप में), ∗ अक्षत – ५० ग्राम, ∗ पान (डंडी सहित)- ५, ∗ सुपारी- २, ऋतुफल, ∗ यज्ञोपवीत -१ जोड़ा (हल्दी से रंगा हुआ), ∗ रोली- १पैकेट, ∗ मौली- १, ∗ धूप- १ पैकेट, ∗ कपूर-१ पैकेट, ∗ रूई- बत्ती के लिये, ∗ वदूध (कच्चा दूध- गाय का)- ∗ ५० ग्राम, दही (गाय का)- ∗ ५० ग्राम, ∗ घी (गाय का)- १ किलो, ∗ शहद (मधु)- ५० ग्राम, ∗ शर्करा (मिश्री)- ५० ग्राम, ∗ छोटी इलायची- ५ ग्राम, ∗ लौंग- ५ ग्राम, ∗ पुष्पमाला, ∗ चंदन- ५० ग्राम, ∗ गंगाजल, ∗ कटोरी, वस्त्र (धोती) ∗ १ जोड़ा, ∗ वस्त्र- सफेद, ∗ पंचपात्र, ∗ पुष्प, ∗ बिल्वपत्र, ∗ आचमनी, ∗ लोटा, ∗ नैवेद्य, आरती के लिये थाली, ∗ मिट्टी का दीपक-५, ∗ कुशासन- २, ∗ खुल्ले रुपये, ∗ चौकी या लकड़ी का पटरा

प्रदोष व्रत उद्यापन पूजन विधि:- (Page 1/5)

उद्यापन के दिन प्रात:काल उठकर नित्य कर्म कर स्नान कर नित्य पूजा करें। प्रदोष काल के पहले दुबारा स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ कर पवित्र कर लें। सभी पूजन सामग्री एकत्रित कर लें। उद्यापन के लिये चाँदी का वृषभ बनवायें। भगवान के तीन नेत्र, पाँच मुख और दस भुजाएँ हों, जिसमें आधे अंग में सती-साध्वी पार्वती का निवास हो। इस प्रकार उमा और महेश्वर की सुवर्णमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। शिव-पार्वती का विग्रह स्वर्ण का हो तो अति उत्तम । पूजा गृह या पूजा स्थान पर चँदोवा लगाकर मण्डप तैयार करें।
पूर्वाभिमुख होकर आसन पर पत्नी सहित बैठ जायें। चौकी पर वृषभ को रखें । वृषभ के पीठ पर ताँबे का पात्र सिंहासन के रूप में रखें। ताँबे के पात्र को सफेद वस्त्र से ढ़ँक कर उस पर भगवान शिव को स्थापित करें।

पवित्रीकरण :-

pradosh vrat udyapan vidhi in hindi