मंदार षष्ठी आरती एवं व्रत कथा

श्री सूर्य आरती
आरती श्री सूर्य जी
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन - तिमिर - निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
सुर - मुनि - भूसुर - वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
सकल - सुकर्म - प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत साहज हरत अति मनसिज-संतापा॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान-मोह सब, तत्त्वज्ञान दीजै॥
॥ जय कश्यप-नन्दन .. ॥
आरती का प्रोक्षण कर सभी को आरती दें। व्रत के दिन केवल मंदार के पुष्प ग्रहण करें। सप्तमी को प्रात:काल उठकर स्नान कर सुर्य देव की पूजा करें। ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दें। तत्पश्चात् पूर्वाभिमुख होकर तेल तथा नमक ग्रहण कर पारण करें ।इस प्रकार से प्रत्येक मास के शुक्ल-षष्ठी को व्रत करें।
मंदार षष्ठी व्रत कथा
भगवान श्री कृष्ण बोले- राजन! अब मैं सभी पापों को दूर करनेवाले तथा समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले मन्दार षष्ठी नामक व्रत का विधान बतलाता हूँ । माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को स्वल्प भोजन कर नियमपूर्वक रहे और षष्ठी को उपवास करे। ब्राह्मणों का पूजन करे तथा मन्दार का पुष्प भक्षण कर रात्रि मे शयन करे। षष्ठी को प्रात:काल उठकर स्नानादि करे तथा ताम्रपात्र में काले तिलों से एक अष्टदल कमल बनाये।
उसपर हाथ में कमल लिये भगवान सुर्य की सुवर्ण की प्रतिमा स्थापित करे। आठ सोने के अर्कपुष्पों से तथा गंधादि उपचारों से अष्टदल –कमल के दलों में पूर्वादि क्रमसे भगवान सुर्य के नाम-मंत्रों द्वारा इस प्रकार पुजा करे- “ऊँ भास्कराय नम: “ से पूर्व दिशा में, “ऊँ सुर्याय नम:” से अग्निकोण में, “ऊँ अर्काय नम:” से दक्षिण में, “ऊँ अर्यम्णे नम: ” से नैर्ऋत्य में, “ऊँ वसुधात्रे नम:” से पश्चिम में, “ऊँ चण्दभानवे नम:” से वायव्यमें, “ऊँ पूष्णे नम: ” से उत्तर में, “ऊँ आनंदाय नम: ” से ईशानकोण में तथा उस कमल की मध्यवर्ती कर्णिका में “ऊँ सर्वात्मने पुरुषायनम: ” यह कहकर शुक्ल वस्त्र, नैवेद्य तथा माल्य एवं फलादि सभी उपचारों से भगवान सुर्य का पूजन करे। सप्तमी को पूर्वाभिमुख होकर तेल तथा लवण भक्षण करे। इस प्रकार प्रत्येक मास की शुक्ल –षष्ठी को व्रतकर सप्तमी को पारण करे। वर्ष के अंत में वही मूर्ति कलश के ऊपर स्थापित कर यथाशक्ति वस्त्र, गौ , सुवर्ण आदि ब्राह्मण को प्रदान करे और दान करते समय यह मंत्र पढ़े -
नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च ।
त्वं च वै तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्॥

अर्थ: हे मन्दारभवन, मन्दारनाथ भगवान सुर्य! आप हमलोगों का इस संसाररूपी पंक से उद्धार कर दें, आपको नमस्कार है।
इस विधि से जो मन्दार षष्ठी का व्रत करता है , वह सभी पापों से मुक्त होकर एक कल्पतक सुखपूर्वक स्वर्ग में निवास करता है और जो इस विधान को पढ़ता अथवा सुनता है, वह भी सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

मंदार षष्ठी उद्यापन विधि:-

यह व्रत पूरे एक वर्ष तक विधिपूर्वक प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को करें। वर्ष के अंत में इस व्रत का उद्यापन करें। षष्ठी को व्रत रख सुर्य भगवान की विधिपूर्वकपूजा करें । सप्तमी को प्रात:काल उठकर शुद्ध हो, स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सुर्य की मूर्ति को कलश पर स्थापित करें । चंदन, अक्षत, धूप, दीप एवं नैवेद्य से विधिपूर्वक सुर्य देव की पूजा करें। उसके बाद कलश को सुर्य की मूर्ति सहित किसी ब्राह्मण को निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ दान दें :-
नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च ।
त्वं च वै तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्॥

सामर्थ्यानुसार अन्य सामग्री भी दक्षिणा के रूप में ब्राह्मण को प्रदान करें।