कोकिला व्रत कथा तथा महात्म्य

राजा युधिष्ठिर ने पूछा- ‘भगवन! जिस व्रत के करने से कुलीन स्त्रियों का अपने पति के साथ परस्पर विशुद्ध प्रेम बना रहे, उसे आप बतलाइये।’
भगवान श्रीकृष्ण बोले- महाराज ! यमुना के तटपर मथुरा नामक एक सुन्दर नगरी है। वहाँ श्रीरामचंद्रजी ने अपने भाई शत्रुघ्न को राजा के पदपर प्रतिष्ठित किया था। उनकी रानी का नाम कीर्तिमाला (श्रुतिकीर्ति) था।वह बड़ी पतिव्रता थी।
एक दिन श्रुतिकीर्ति ने अपने कुलगुरु, वसिष्ठ मुनि से प्रणाम कर पूछा- ‘ मुनिश्रेष्ठ ! आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतायें, जिससे मेरे अखण्ड सौभाग्य की वृद्धि हो।’
वसिष्ठजी ने कहा- कीर्तिमाले ! कल्याणकामिनी स्त्री आषाढ़ मास की पूर्णिमा को सायंकाल यह संकल्प करे कि –‘श्रावण मासभर नित्य-स्नान, रात्रि-भोजन और भूमि शयन करूँगी तथा ब्रह्मचर्य से रहूँगी और प्राणियों पर दया करूँगी।’
प्रात: उठकर सब सामग्री लेकर नदी, तालाब आदि पर जाय । वहाँ दंतधावन कर सुगंधित द्रव्य, तिल और आँवले का उबटन लगाये और विधि से स्नान करे। इस प्रकार आठ दिनतक स्नान करे। अनंतर सर्वौषधियों का उबटन लगाकर आठ दिन तक स्नान करे। शेष दिनों मे वच का उबटन मलकर स्नान करे। तदनंतर सुर्य भगवान का ध्यान करे। इसके बाद तिल पीस करके उससे कोकिला पक्षीकी मूर्ति बनायें। रक्त चंदन, चम्पा के पुष्प, पत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, चावल, दूर्वा आदि से उसका पूजन कर इस मंत्र से प्रार्थना करे:-
तिलसहे तिलसौख्ये तिलवर्णे तिलप्रिये।
सौभाग्यद्रव्यपुत्रांश्च देहि मे कोकोले नम:॥

अर्थ:- ‘ तिलसहे कोकिला देवि ! आप तिलके समान कृष्णवर्णवाली हैं। आपको तिलसे सुख प्राप्त होता है तथा आपको तिल अत्यंत प्रिय है। आप मुझे सौभाग्य, सम्पत्ति तथा पुत्र प्रदान करें। आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार पूजन कर घर में आकर भोजन ग्रहण करे। इस विधि से एक मास व्रत कर अंत में तिलपिष्ट की कोकिला बनाकर उसमें रत्न के नेत्र और सुवर्ण के पंख लगाकर ताम्रपत्र में स्थापित करे। दक्षिणा सहित वस्त्र, धान्य और गुड़ ससुर, दैवज्ञ,पुरोहित अथवा किसी ब्राह्मण को दान करे।
इस विधि से जो नारी कोकिलाव्रत करती है, वह सात जन्मतक सौभाग्यवती रहती है और अंत में उत्तम विमान में बैठकर गौरी लोक को जाती है। वसिष्ठजी से व्रत का विधान सुनकर कीर्तिमाला ने उसी प्रकार कोकिलाव्रत का अनुष्ठान किया। उससे उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र, सुख-समृद्धि और शत्रुघ्नजी की कृपा एवं प्रीति प्राप्त हुई। अन्य भी जो स्त्रियाँ इस व्रत को भक्तिपूर्वक करती हैं उन्हें भी सुख, सौभाग्य आदि की प्राप्त होती है।
वसिष्ठजी ने कहा- हे कीर्तिमाले ! अब मैं तुम्हें इस व्रत की कथा बताता हूँ; ध्यान से सुनो :-
एक बार की बात है प्रजापति दक्ष ने अपने यहाँ यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवी-देवता, यक्ष,गंधर्व इत्यादियों को प्रजापति दक्ष ने आने का निमंत्रण भेजा ; लेकिन महादेवजी को निमंत्रण नहीं भेजा। दक्ष प्रजापति माता सती के पिता हैं। अत: उन्हें भी इससे बहुत दु:ख हुआ, लेकिन माता सती ने महादेव जी से यज्ञ में सम्मिलित होने कहा। महादेव जी ने सती माता को समझाया कि बिना निमंत्रण के वहाँ जाना उचित नहीं है। लेकिन माता सती ने महादेवजी की बात नहीं मानी और यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये अपने पिता दक्ष के घर को चली गई। जब सती अपने पिता के घर पहुँची तब किसी ने भी उनका स्वागत नहीं किया। अन्य अतिथियों के लिये उचित व्यवस्था की गई थी। यज्ञ शुरु होने के पश्चात् प्रजापति दक्ष ने महादेव जी के विषय में अपमानजनक बातें कहीं, जिसे माता सती सहन ना कर सकी और यज्ञ के अग्नि कुण्ड में अपने आप को जलाकर भस्म कर लिया। महादेवजी को जब यह सूचना मिली तब क्रोधित हो उन्होंने अपने गणों को भेजकर यज्ञ सहित सभी उपस्थित जनों का विध्वंस कर दिया। यह सब देखकर देवता गण उनकी स्तुति करने लगे जिससे प्रसन्न हो कर उन्होंने सभी को पूर्णांग कर दिया। किंतु सती को श्राप दे दिया कि जाओ पक्षियोनि को प्राप्त होकर कोकिला बन जाओ। इसी श्राप के कारण माता सती नंदन-वन में कोकिला के रूप में दस हजार वर्ष तक विचरती रही और तपस्या करती रही। जिसके फलस्वरूप उनका जन्म पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में हुआ। पार्वती के रूप में जन्म लेने के बाद उन्होंने कोयल रूपी सती का पूजन एवं व्रत किया और एक बार फिर से महादेवजी को अपने पति के रूप में पाया।