बुद्ध द्वादशी व्रत | Budh Dwashi Vrat

श्रावण मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को बुद्ध द्वादशी व्रत होता है । इस तिथि को भगवान बुद्ध की पूजा की जाती है । इस व्रत को करनेवाले को राज्य सुख की प्राप्ति होती है। व्रती मनुष्य की द्वादशी देवी हमेशा रक्षा करती है।

पूजा सामग्री

व्रत विधि:-

इस प्रकार ध्यान कर पुन: भगवान् जनार्दन को स्मरण करते हुए हाथ में जल लें और उन प्रभु के लिये अंजलि से अर्घ्य दे। अर्घ्य देते समय निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिये:-

एकादश्यां निराहार: स्थित्वा चैवापरेऽहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरिकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥

अर्थ:-‘कमल के समान नेत्रसे शोभा पानेवाले भगवान् अच्युत! आज एकादशी तिथि है। अत: मैं निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप ही मेरे शरण हैं।’
इस प्रकार कहकर दिनमें नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रि के समय देवाधिदेव भगवान नारायण के समीप बैठकर ‘ऊँ नमो नारायणाय’ इस मंत्र का जप कर व्रती को सो जाना चाहिये। फिर प्रात:काल होनेपर व्रती पुरुष समुद्रतक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाबपर जाकर अथवा घर पर सन्यमपूर्वक रहकर हाथ में पवित्र मिट्टी लेकर यह मंत्र पढ़े-
धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा।
तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते॥
ब्रह्माण्डोदरतीर्थानित्वयास्पृष्टानि काश्यपि॥
तेनेमां मृत्तिकां त्वत्तो गृह्य स्थास्येऽद्य मेदिनि।

सभी पूजन सामग्री एकत्रि कर लें। आसन पर बैठ जाये। हाथ में अक्षत, कुंकुम, रोली एवं पुष्प लेकर श्रीहरि की निम्न मंत्रों से पूजन करें:-

इस प्रकार सम्यक् रीति से पूजाकर पहले के ही समान कलश स्थापित करे और दो वस्त्रों से उसे आच्छादित कर उसके ऊपर सम्पूर्ण संसार को अपने उदर में धारण करने की शक्तिवाले देवेश्वर भगवान श्रीहरि की सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। फिर विधान के अनुसार गन्ध, पुष्प, आदि से क्रमश: पूजन करे। तत्पश्चात् वेद और वेदांग के पारगामी ब्राह्मण को वह प्रतिमा दे। हे मुने! यह विधि श्रावण मास की एकादशी व्रत की कही गयी है। इस प्रकार नियम के साथ यदि व्रत किया जाय तो उसका जो प्रभाव होता है उसे कहता हूँ सुनो।

प्राचीन समय की बात है- सत्ययुग में नृग नामसे प्रसिद्ध एक प्रतापी नरेश थे। जिन्हें आखेट का (शिकार) बड़ा शौक था। अत: प्राय: वे गहन वनों में घूमते रहते थे। एक समय की बात है, वे घोड़े पर चढ़कर किसी वन में बहुत दूर चले गये, जहाँ सिंह, बाघ, हाथी, सर्प और डाकुओं का निवास था। राजा नृग के पास इस समय अन्य कोई सहायक भी न था। वे घोड़े को खोलकर् एक वृक्ष के नीचे श्रम से थककर सो गये। इतने में ही रात हो गयी और चौदह हजार व्याधों का एक दल मृगों को मारने के विचार से वहाँ आ गया। व्याधों ने देखा राजा सोये हैं। उनका शरीर सोने का और रत्नों से सुशोभित है। लक्ष्मी उनके अंग-अंग की शोभा बढ़ा रही हैं। अत: वे सभी वधिक तुरंत अपने सरदार के पास गये और उसे इसकी सूचना दी। सुवर्ण और रत्न के लोभ में पड़कर वह सरदार भी राजा नृग को मारने के लिये उद्यत हो गया और वे व्याध हाथ में तलवार लेकर उन सोये हुए राजा के पास पहुँच गये। वे उन्हें पक‌ड़ना ही चाहते थी कि राजा के शरीर से सहसा चंदन-माल्यादि से विभूषित एक स्त्री प्रकट हो गयी। उसने चक्र उठाकर सभी व्याधों तथा मलेच्छों को मार डाला। उनका वधकर वह देवी उसी क्षण पुन: राजा नृग के शरीर में समा गयी। इतने में राजा भी जग गये और देखा कि म्लेच्छ नष्ट हो गये हैं और देवी शरीर में प्रविष्ट हो रही है। अब राजा घोड़े पर सवार होकर वामदेव जी के आश्रमपर गये और उन्होंने भक्तिपूर्वक उनसे पूछा- भगवन! वह स्त्री कौन थी तथा वे मरे हुए व्याध कौन थे? आप मुझपर प्रसन्न होकर इस आश्चर्यजनक घटना का रहस्य बताने की कृपा कीजिये।
वामदेवजी बोले- राजन! इसके पूर्वजन्म में शूद्रजाति में तुम्हारा जन्म हुआ था। उस समय ब्राह्मणों के मुख से तुमने श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी व्रत के अनुष्ठान की बात सुनी और राजन! बड़ी श्रद्धा के साथ विधिपूर्वक तुमने उस दिन उपवास भी किया। अनघ! उसी का परिणाम है कि इस समय तुम्हें राज्य उपलब्ध हुआ है। वही द्वादशी देवी सम्पूर्ण आपत्तियों में साकार होकर तुम्हारी रक्षा करती हैं। उसी के प्रयास से ये घोर पापी एवं निर्दयी म्लेच्छ जीवन से हाथ धो बैठे हैं। राजन! श्रावण मास की यह द्वादशी ही तुम्हारी रक्षिका हैं। इसमें इतनी अपार शक्ति है कि सहसा प्राप्त विपत्ति-काल में भी तुम्हारी रक्षा हो जाती हैं और इसकी कृपा से तुम्हें राज्य भी सुलभ हो गया है।

॥ इति ॥