आरती के पद

मोर-मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उस माल ।
इहि वानिक मो मन बसौ सदा बिहारी लाल ॥
पाग बनौं पटका बन्यौं, बन्यौ लाल को भेष ।
जै जै श्रीकुंजबिहारी लाल की दऔड़ आरती लेय ॥
आरती कीजै श्रीनवनागर की
खंजन नैन बैन रसमाते रूप सुधा-सागर की ॥
पान खात मुसकात मनोहर, मुख सुषमा आगर की ।
श्री रसिक सखी दम्पती आरती सों नैन सैन उजागर की ॥
ऐसे ही देखत रहौ जनम सुफल करि मानौ।
प्यारे की भामती जु भामती के प्राण प्यारे जुगलकिशोरहिं जानौ ।
छिन न टरौ पल होंहु न इत उत रहौं एक ही तानों ।
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा श्रीकुंजबिहारी मन रानों ।